शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

Takwar ki dhaar


तलवार की धार

सास की आस अब भी खत्म नहीं हुई है । वह सोचती है बहू अब तो उसकी कदर समझेगी । बहू का घर उसके बिना नहीं चल पाऐगा । उधर बहू का कहना है मैं बुढिया की सेवा क्यों करूं ? उसको टुकड़ा इस लिए डाल रही हूं कि लोग क्या कहेंगें ? भले ही इसने जवानी में मेरे साथ कुछ भी किया हो । मैं इस घर में आई थी तब मेरे साथ जो इसने किया था उसे याद करती हूं तो मेरा खून खोलने लगता है । फंस गया है बेचारा बिमल । एक तरफ मां है तो दूसरी तरफ पत्नी , करे तो क्या करे ? मां का जीवन जिन अभावों में गुजरा है उसको पत्नी जानना ही नहीें चाह रही । पत्नी जिसे सेवा कह रही है बिमल को लगता है वह फर्ज मान्न निभाया जा रहा है । मां और पत्नी दोनों दिन भर तलवारें निकाले घूमती रहती हैं , बिमल का जीवन तलवार की धार पर चलने जैसा होकर रह गया है । 

Duveedha

दुविधा
राजीव ने पे्रम विवाह का फल खाया है । जिन सासों में कभी खुषबू आती थी अब हालात ये हैं जिस दिन भी वह दफतर नहीं जा पाता, घर में महाभारत होना निष्चित है । अब तो औलाद षादी के लायक हो गइ्र्र है । बेटा बड़ा है । वह नहीं चाहता उसका बेटा कोई गलत फैंसला ले और फिर जीवन भर पछताए । जो भी हो पर प्रेम विवाह के बारे में वह अपनी औलाद को मार नहीं खाने देगा । कैसे सारे गुण एक एक करके अवगुण में बदल जातें हैं मुझ से बेहतर भला कौन जान सकता है ? पर करे तो,करे क्या ? सोचता है जब मैं अपने ही फैंसले पर पछता रहा हूं , तो बेटे के लिए सही लड़की कैसे ढूंढ सकता हूं ? पत्नी यह फैंसला ले यह तो उसे किसी सूरत में मंजूर नहीं । करे तो , करे क्या ? अजीब दुविधा में फंस गया है ।

शनिवार, 12 नवंबर 2011

seekh

बौराए पेड़ पर तोता और गिलहरी अपना भोजन चुन रहे थे उघर नन्ही बैया फुदक फुदक कर फूल खा रही थी नीचे पानी के नल पर औरतें अपनी अपनी बाल्टी अड़ाने की कोशिश में लड़ रहे थे । आदम जात कोई सीख लेना ही नही चाह रही ।

Fail

साइकिल के फ्राइव्हील में खराबी आ जाती है तो कहते हैं कूत्ते फेल हो गए,,,,,,,,,,,,कुत्तों के फेल होने का क्या मतलब ? पास कब होते हैं ?

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

jhaaat

झात सा मुहं किब हुया करै ? एक इडी उम्र का माणस स्टेज पै चुटकला सुणाव था । एक बोल्याा ,,,,रै वाह ताउ,,,,,,,,, मैं लेरा ताउ नही फूफा लागु सूं ,,,,,,,,,,,बोलणिए का मुहं झात सा हो ग्या

बुधवार, 9 नवंबर 2011

bhasker 9th nov 2011

..सोच

वनिता बहू ढूंढ रही है। ‘कैसी लड़की चाहिए?’ मैंने यूं ही टाइमपास के लिए पूछ लिया और वह शुरू हो गई, ‘सोचती हूं, ऐसी लड़की मिल जाए तो ठीक रहेगी, जो अपने माता-पिता की पहली संतान हो। ऐसे बच्चे ज़्यादा तंदुरुस्त होते हैं।’ मैं सुनकर दंग रह गई कि लोग कहां तक सोच लेते हैं। फिर उसकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी, ‘इनके पापा कह रहे थे, ‘लड़की के यहां भाई न हो तो और सही रहता है। कुछ मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, सब अपने आप ही मिल जाता है। कई लोगों के पास तो कई एकड़ जमीन भी होती है।’ मैं तो इनके पापा को कह रही थी, ‘रिश्ता गुडग़ांव या नोएडा का ही देखना, वहां की ज़मीनें बड़ी महंगी हैं।’ मुझसे रहा न गया। ‘वनिता, कुछ तो शर्म कर। पिछले साल ही तूने अपनी बेटी का ब्याह किया है। ‘दामाद विदेश में नौकरी कर रहा है। तो कार देने का क्या फायदा? मेरी बेटी को कौन सा इंडिया में रहना है।’ तू यही कहती थी न। फर्नीचर देने का भी क्या फायदा कहकर अलमारी तक नहीं दी तूने बेटी को और अब तुझे ज़मीन चाहिए?’ वनिता मेरा मुंह ताक रही थी, फिर आहिस्ता से मैंने पूछा, ‘मैंने कुछ गलत कहा क्या बहना?’ वह चुप थी।
आप मेरी नो नवम्बर के भास्कर में छपी लधुकथा पढने का समय निकाल पाए तो मुझे खुशी होगी ।

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